श्रील प्रभुपाद – भारत के अध्यात्मिक राजदूत – 850 से उपर इस्कॉन मंदिर

(आज हम जानेंगे श्रील प्रभुपाद का जीवन परिचय और वर्तमान मे 850 से उपर इस्कॉन मंदिर होने वाले hare krishna movment के बारे मे)
हमारे इस पवित्र भारत भूमि पर अनेको संत होकर गए है। लाखों वर्ष पूर्व इस भूमी पर सनातन संस्कृति फल-फूल रही थी। आज भी फल-फूल रही है और भविष्य मे भी एकमात्र सनातन संस्कृति ही रहेगी।
हमारे सनातन धर्म मे चार वैष्णव सांप्रदाय है। शास्त्रों के द्वारा यह चार वैष्णव सांप्रदाय प्रमाणित माने गए है। इन चार वैष्णव सांप्रदायो मे भगवान के अनेकों परमभक्त होकर गए है। उन चार सांप्रदायों मे एक गौडीय वैष्णव सांप्रदाय है।

आज हम “भारत के अध्यात्मिक राजदूत” इस नाम से विश्वविख्यात होने वाले ‘अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद’ के जीवन के विषय मे विस्तार से जानेंगे।

श्रील प्रभुपाद

व्यक्तिगत जीवन का परिचय –

श्रील प्रभुपाद कोई सामान्य व्यक्ति नही थे। 1 सितंबर 1896 को कलकत्ता मे भक्तिवेदांत स्वामी प्रभूपाद का जन्म हुआ था। भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद एक प्रसिद्ध गौडीय वैष्णव गुरू और सनातन धर्म के प्रचारक थे। बचपन मे उनका नाम ‘अभय चरण दे’ ऐसा था। उनके पिता का नाम ‘गौर मोहन दे’ था। उनकी माता का नाम ‘रजनी दे’ ऐसा था। भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के माता-पिता दोनों वैष्णव थे। उनका जन्म एक वैष्णव परिवार मे हुआ था।{ इस्कॉन के कार्यक्रम }

जिसप्रकार आकाश मे हमे बारिश होने से पहले ही बारिश के लक्षण दिखाई पड़ते है उसीप्रकार बचपन मे श्रील प्रभुपाद के परमभक्त होने के लक्षण दिखाई पड रहे थे। जन्म के 14 साल के बाद यानी कि जब अभय चरण दे 14 साल के थे तब उनकी माता का देहांत हो गया था। उसके बाद उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में अंग्रेजी में पढ़ाई की। प्रभूपाद शुरू से पढ़ाई में बहुत तेज थे। आजादी के दौरान उन्होने गांधीजी के नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट में शामिल हो गए थे। तब उन्होंने अपनी डिग्री को लेने से इनकार कर दिया था। प्रयागराज मे उनका खुद का फार्मसी का दुकान था।

{ सनातन धर्म मे गौ माता का महत्व }

श्रील प्रभुपाद के गुरु महाराज –

भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी के गुरू,गौडीय वैष्णव सांप्रदाय के एक बहुत ही उच्चकोटी के भक्त थे। भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद जी के गुरू का नाम “श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर” है। भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर महाराज भगवान के परम भक्त थे। आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ मे उन्हे “THE LION GURU” भी कहते है। (इस्कॉन मंदिर)

1922 मे वो उनके गुरू महाराज जी से मिले थे। जब प्रभूपाद उनके गुरु महाराज से मिले थे तभी उनके गुरु महाराज को समझ आया की “अभय चरण डे” बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलते है। प्रभूपाद को अंग्रेझी का बहुत ज्ञान था। जब प्रभुपाद अंग्रेजी बोलते तो ब्रिटिश लोग भी अपना शब्दकोश निकालकर देखते की वो क्या बोल रहे है।

तभी उनके गुरु ने कहा की तुम्हारी अंग्रेजी बहुत अच्छी है और तुम्हारा मन शास्त्रों में भी लगता है। इसीलिए क्या तुम भगवत गीता को अंग्रेजी में लिख सकते हो? क्योंकि हमारे किताबों का प्रसार विदेश में नहीं हो रहा है लेकिन विदेशी किताबें हमारे देश मैं बहुत प्रसारित हो रही है। इसलिए तुम्हें भगवत गीता को अंग्रेजी में लिखकर पूरी दुनिया तक पहुंचाना चाहिए। उसके बाद उन्होने अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए अगले दिन से ही भगवत गीता को अंग्रेजी में लिखना शुरु कर दिया। ध्यान देने की बात यह है कि तब के जमाने में कोई टाइपराइटर नहीं होता था। लेकिन प्रभुपाद को भगवतगीता जैसा 700 श्लोकों वाले ग्रंथ का अनुवाद करने के लिए पूरा 1 साल लगा। (इस्कॉन मंदिर)

घर का त्याग करना –

प्रभुपाद ने खूब सारी पृष्ठों में भगवत गीता को अंग्रेजी में लिखा लेकिन एक दिन जब श्रील प्रभूपाद अपनी फार्मेसी के दुकान से घर को लौटे तो वह चौंक गए। क्योंकि उन्हे इतने दिनों से लिखे हुए भगवतगीता के कागज नहीं दिख रहे थे। उसके तुरंत बाद उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा क्या तुमने मेरे कागज देख है? पत्नी का जवाब सुनते ही उनके पसीने छूट गए। उनकी पत्नी ने कहा मैंने सारे कागज को रद्दी वाले को बेच दिया। कागज के बदले में उसने मुझे चाय पत्ती दि। यह सुनते ही प्रभुपाद के होश उड़ गए। उन्होंने गुस्सा नहीं किया। इस घटना से श्रील प्रभूपाद को मन ही मन ऐसा लगा की गृहस्थ आश्रम मे रहकर वो गति से अध्यात्मिक कार्य नही कर सकते। इसलिए उन्होंने उसी समय अपना घर त्याग दिया।

श्रील प्रभुपाद के अध्यात्मिक जीवन का आरंभ –

गृहस्थ जीवन को त्यागकर “अभय चरण डे” एक नए जीवन की ओर प्रस्थान कर गए। उसके बाद उन्होंने फिर से भगवतगीता को लिखना शुरू किया और वृंदावन की ओर चल पड़े। और कई साल वृंदावन में अपने दिन गुजारे लेकिन उनको पता था की अगर वह वृंदावन में ही रह गए तो वह कभी भी बाहरी देशो मे भगवत गीता का प्रचार नही कर सकते। और उनको यह भी पता था दुनिया का नंबर वन देश है अमेरिका और अमेरिका का नंबर वन शहर है न्यूयॉर्क। इसीलिए उन्होंने न्यूयॉर्क जाने का फैसला किया। (इस्कॉन मंदिर)

जब उन्होने न्यूयॉर्क जाने का फैसला किया था तब वो 70 साल के थे। 70 साल की अवस्था मे उन्होंने जहाज से अमरिका जाने का निश्चय किया। सिर्फ यही नहीं उनको सफर के दौरान दो दिल के दोरे भी आए। और उनके पास सिर्फ 7 डॉलर और कुछ किताबे थी। प्रभुपाद को पता था अमेरिका में उन्हे कोई नहीं जानता था। लेकिन वो अमेरिकन्स को जानते थे। उनके जीवनशैली को वह जानते थे उनके बात करने के ढंग को वह जानते थे। भगवान श्री कृष्ण का नाम लेते लेते भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद न्युयॉर्क पोहोच गए।

इस्कॉन मंदिर

प्रचार कार्य का आरंभ –

जब श्रील प्रभुपाद अमेरिका मे पहुंच गए थे तब अमेरिका और वियतनाम का युद्ध चल रहा था। तब अमेरिका मे हिप्पी जाती के लोग आ गए थे। वो लोग अमेरिकी नागरिकों को परेशान कर रहे थे। इस हिप्पी जाती के लोग बिना वस्त्र धारण किए अमेरिका मे खुलेआम घुम रहे थे। दिन-रात वह लोग नशे मे रहते थे। उस वक्त अमेरिकन सरकार भी उनसे परेशान हो गई थी। प्रभुपाद ने सोचा की अगर मै हिप्पीस को सुधार देता हू तो सारा अमेरिका मुझे जान जाएगा और फिर अच्छी तरीके से प्रचार होगा।

जब प्रभूपाद हिप्पीस को कुछ बताने जाते तो हिप्पी लोग उनकी सुनते नही थे। कभी-कभी हिप्पी लोग उनका सामान चोरी करते,कभी उनके उपर सिग्रेट फुकते तो कभी को टाॅयलेट की लाईन से धक्का मारकर पीछे कर देते। पर फिर भी प्रभुपाद उनके ऊपर गुस्सा नही करते। प्रभूपाद उनके लिए भोजन बनाते,सुबह श्याम भगवद्गीता का पाठ पढाते। प्रभुपाद उनको मीठे-मीठे पदार्थ बनाकर खिलाते।

हिप्पी जाती के लोगो मे परिवर्तन –

धीरे-धीरे हिप्पीस को प्रभुपाद की बात समझ आने लगी। धीरे-धीरे उनमे परिवर्तन होने लगा। एकबार एक व्यक्ति श्रील प्रभुपाद के सामने नशा कर रहा था। तभी प्रभुपाद ने उससे कहा की क्या तुम इससे भी बेहतर नशे का अनुभव करना चाहते हो? तभी उस व्यक्ति ने पुछा की ऐसा कोनसा नशा है आपके पास,प्रभुपाद ने कहा “मेरे पास हरिनाम का नशा है एकबार चढ गया तो फिर कभी नही उतरता,यह एकमात्र ऐसा नशा है जो सदा के लिए रहता है”। धीरे-धीरे सभी लोग प्रभुपाद की बात सुनने लगे। तभी प्रभुपाद को समझ आया की हिप्पीस ने पहले ही उनके घर छोड दिए है,और अगर मैने इनको जीवन का मर्म सिखा दिया तो यह मेरी बात जरूर मानेंगे और इनकी वजह से मै मे मेरी बात को दुनिया मे पहुंचा सकता हू। मन मे परिवर्तन आने की वजह से सारे हिप्पीस हॅप्पी बन गये| (इस्कॉन मंदिर)

पहले हिप्पीस जो बुरे कार्य करते थे,वो बंद होने लगे। उन्हे अच्छी संगती के कारण अच्छी आदते लग गई। शास्त्रो के विचार सुनकर विदेशी लोग भी सनातन संस्कृती से जुडने लगे। अमेरिका मे कुछ ही वर्षों मे प्रभुपाद के 10000 शिष्य बन गए।

आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ की स्थापना (इस्कॉन) –

श्रील प्रभुपाद अमेरिका मे सनातन धर्म का प्रचार करने के लिए गए थे। पाश्चिमात्य लोगों मे कृष्णभावनामृत का प्रचार करने मे वो सफल हो रहे थे। तभी उन्होंने 13 जुलाई 1966 मे “आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ”(इस्कॉन) की स्थापना की। न्युयार्क मे उन्होंने “आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ” जो कि इस्कॉन के नाम से प्रचलित है उसकी स्थापना की थी। लोगों को अध्यात्मिक शिक्षा देना,लोगो को अध्यात्म के बारे मे सचेत करना और दुनिया के कोने कोने को कृष्णभावनाभावित बनाना,ऐसे उद्देश्य आखों के सामने रखकर प्रभुपाद ने ISKCON की स्थापना की थी।

श्रील प्रभुपाद ने लायी पाश्चिमात्य देशो मे क्रांती –

आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (इस्कॉन) ने पाश्चिमात्य देशों मे क्रांति लाई है। पाश्चिमात्य देशों के लोग,मानवों से दानव बन गए थे। पाश्चिमात्य लोग मांसाहार करना,अलग-अलग प्रकार का नशा करना अवैध मैथुन करना इत्यादी घिनौने कार्य करते थे। ‘आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ’ ने वहाके लोगो को दानवो से मानव बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया था। और आज हम उस कार्य का परिणाम तो देख हि सकते है। आज पाश्चिमात्य लोग भी भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति मे लीन रहने लगे है। यही आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ की बडी सफलता है। इस सफलता के पीछे भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का ही योगदान है|

क्या कोई व्यक्ति पाकिस्तान जैसे जिहादी राष्ट्र मे 12 हिंदू मंदिर बना सकता है?

भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने पाकिस्तान मे “आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ” के 12 मंदिर बनवा दिये है| उनका यह सनातन धर्म के लिये बहुत बडा योगदान है| आज ISKCON दुनिया का एक प्रसिद्ध संगठन है। आज की घडी मे पूरी दुनिया मे ISKCON के 850 से ज्यादा मंदिर कार्यरत है। आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ जैसे इतने बडे संगठन को भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने HARE KRISHNA MOVEMENT के नाम से खडा किया।

प्रचार कार्य मे सफलता –

कुछ ही वर्षो मे अमेरिका मे श्रील प्रभुपाद के 10000 शिष्य बन गए | उन्होने 10 हजार में से दो शिष्यो को ऑस्ट्रेलिया भेजा ,दो शिष्य को रशिया भेजा,दो शिष्यो को यूरोप भेजा,और आखिर पाकिस्तान तक उन्होंने अपने शिष्यो को भेज दिया। प्रभुपाद रुके नहीं अपने शिष्य और शिक्षा को पूरी दुनिया तक भेजते रहें| प्रभुपाद अपने शिष्योको यही बताते की अब भगवतगीता को पूरी दुनिया तक पहुंचाने काम आपका है,मैने तुम्हें जो सिखाया उसे तुम दूसरों को सिखाओ और उनसे कहो कि वह किसी और को सिखाएं। 1965 से लेकर 1977 तक यानी कि 11-12 साल तक वह अपने शिष्यों को पूरी दुनिया में भेजते रहे। (इस्कॉन मंदिर)


पुस्तक वितरण –

धीरे-धीरे उनके पैसे खत्म होने लगे। पैसे कम होने के कारण उन्होंने अगरबत्तीया बेचना शुरू कर दिया| वह अगरबत्तीया बनाते और बेचते थे। वह अपने शिष्यों की मदद से हर रोज अगरबत्तीया बनाते और बेचते थे। तीन सालों के अंदर अंदर प्रभुपाद को 1 मिलियन डॉलर मिले। इस दौरान भी वो अपने गुरु के आदेश का पालन करते रहे। इस दौराण उन्होने पूरी दुनिया में साडे पांच करोड पुस्तके बांटी (book distribution)। पुस्तके बेचने से जो पैसा इनको मिला उसी पैसे से उन्होने मंदिर बनाना शुरू कर दिया। उन्होने अपने पुस्तको को पूरे 25 भाषाओं में ट्रांसलेट किया और प्रभूपाद ने बहुत ही ज्यादा नाम कमा लिया| प्रभुपाद कभीबी उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे मे बात नही करते थे,वो सदा भगवान के बारे मे बात करते थे इस कारण से उस समय पुरी अमेरिका उनके नाम से परिचित हो गई।

प्रभुपाद के पास अपने शिष्य को देने के लिए पैसे नहीं थे लेकिन फिर भी श्रील प्रभुपाद ने उस समय 108 मंदिर बनाए थे| पूरे 6 महाद्वीपों में। और उन्होंने यह तब किया जब कोई दान नहीं करता था,कोई लोन नहीं देता था। अपने शिष्यों से वह पत्र के माध्यम से बात करते थे| इसीलिए अपने जीवन भर में इन्होंने 10000 से भी ज्यादा पत्र लिखे लेकिन तभी भी यह किताबे लिखना भूले नहीं थे।

भागवतधर्म की शिक्षा –

एक समय उनके पास एक रिपोर्टर आया था और उसने उनसे पूछा था की “स्वामी जी क्या आप भी भगवान है क्या”? तब प्रभुपाद जी ने कहा था की मैं कोई भगवान नहीं हूं क्योंकि भगवान से बढ़कर कोई नहीं है इस दुनिया में। मैं तो एक साधारण सा मनुष्य हूं और भगवान का सेवक हूं| यह सुनकर वह रिपोर्टर चौक गया। क्योंकि पहली बार कोई स्वामी यह कह रहे थे कि वह कोई भगवान नहीं है बल्कि वह तो भगवान के सेवक हैं|

श्रील प्रभुपाद की अल्फ्रेड फोर्ड से मुलाकात –

श्रील प्रभुपाद का नाम पुरी अमेरिका मे फैल गया था| उनके नाम के चर्चे सुनकर एक दिन हेनरी फोर्ड के पोते ल्फ्रेड फोर्ड प्रभुपाद से मिलने आये थे| प्रभुपदा ने उनसे पूछा “who is Henry Ford?” तो उन्होंने बताया हेनरी फोर्ड, फोर्ड कंपनी के संस्थापक। प्रभुपाद ने फिर उनसे पूछा “now where he is?” तब हेनरी फोर्ड जीवित नहीं थे। उसके तुरंत बाद अल्फ्रेड फोर्ड को समझ आ गया की हर मनुष्य खाली ही इस दुनिया में आता हैं और खाली हाथों से ही इस दुनिया से चला जाता है। उसके बाद अल्फ्रेड फोर्ड ने प्रभुपाद के सामने भगवतगीता सिखाने की इच्छा व्यक्त की और उसके बाद प्रभुपाद ने उन्हे सनातन धर्म की शिक्षाए सिखाना प्रारंभ किया|(iskcon full form in hindi – आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ)

विदेशो मे रथयात्रा –

जगन्नाथ रथ यात्रा
founder acharya of iskcon

एक बार वह उनके शिष्य के साथ जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल होने के लिए गए। लेकिन पुजारी ने उनको रोक दिया यह कहते हुए कि अंग्रेजों को मंदिर में जाने की इजाजत नहीं है। इसके बाद प्रभुपाद जगन्नाथ जी के पास नही गए। लेकिन उन्होंने जगन्नाथ जी को पूरी दुनिया के पास लाया। यानी कि उन्होंने ही पहले रथयात्रा को विदेशों में भी शुरू किया।

food for life –

भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने एक योजना शुरू कि उसका नाम था “फूड फॉर लाइफ”| यह दुनिया की सबसे बड़ी शाकाहारी फूड रिलीफ योजना हैं। हर इस्कॉन के मंदिर में आपको भोजन मिलेगा। और यह सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के इस्कॉन के मंदिर में आपको भोजन मिलेगा। यहां तक कि एप्पल मोबाइल कंपनी के संस्थापक यानी कि स्टीव जॉब्स ने भी खुद कहा है की पहले उनके पास पैसे नहीं होते थे इसीलिए वह सात मैल चलकर इस्कॉन के मंदिर में जाकर अपनी भूख मिटा ते थे। इस्कॉन आज भी 14 लाख से भी ज्यादा गरीब बच्चों को खाना खिला कर उनके पेट भरते हैं। इस्कॉन

श्रील प्रभुपाद का अंतिम समय –

श्रील प्रभुपाद की उम्र बहुत ही ज्यादा हो गई थी| इसलिए वो आवाज रिकॉर्ड करने के यंत्र का उपयोग करके आवाज रिकॉर्ड करते थे और उस रिकॉर्डिंग से उनके शिष्य किताबे लिखते थे। यह जानकर आपको बहुत ही ज्यादा आश्चर्य होगा की प्रभुपाद हर बार रिकॉर्डिंग करते थे यानी कि 24 घंटे में से वह 22 घंटे काम करते थे और सिर्फ 2 घंटे ही सोते थे। उन्होंने अपने हर साधारण शिष्य को असाधारण शिष्य बना दिया था। प्रभुपाद के शिष्य उनको तंग करते थे,लेकिन वो उनपर गुस्सा नहीं करते थे।

यह बात है 1977 की, प्रभुपाद के पास समय बहुत ही कम था। वह बहुत ही ज्यादा पतले हो गए थे यहां तक कि उनके शरीर में सिर्फ हड्डियां थी इसीलिए डॉक्टर उनके हाथ पकड़ने के लिए भी डरता था। लेकिन उस वक्त में भी वह किताबो को इंग्लिश में ट्रांसलेट करते रहे और ट्रांसलेट करते-करते 14 नवंबर 1977 को वह वैकुंठ धाम को चले गए। प्रभुपाद कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे उनके जीवन से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

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श्रील प्रभुपाद pranam mantra in hindi –

नमः ॐ विष्णु पादय, कृष्ण पृष्ठाय भूतले, श्रीमते भक्ति वेदांत स्वामिन इति नामिने । नमस्ते सारस्वते देवे गौर वाणी प्रचारिणे, निर्विशेष शून्य-वादी पाश्चात्य देश तारिणे ।।

pancha tattva mantra in hindi –

(panchtatva mantra iskcon)

जय श्री कृष्ण चैतन्य,प्रभु नित्यानंद,
श्री अद्वैत,गदाधर,श्रीवास आदि गौर भक्त वृन्द ।।

krishna pranam mantra in hindi –

(most powerful shri krishna mantra in hindi)

हे कृष्ण करुणा-सिंधु, दीन-बन्धु जगत्पते । 
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोस्तुते ॥

radha rani pranam mantra –

तपत-कांचन गौरांगी, राधे वृन्दावनेश्वरी ।
वृषभानु सुते देवी, प्रणमामि हरी प्रिये ॥

vaishnav pranam mantra in hindi –

वांछा-कल्पतरूभयशच कृपा-सिंधुभय एव च ।
पतितानाम पावने भयो वैष्णवे नमो नमः ॥

iskcon meaning in hindi

“आंतराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ” international society for krishna conciousness.

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