Shri Krishna Janmashtami-श्रीकृष्ण जन्म के समय प्रकृति मे हुए शुभ बदलाव

(Shri Krishna Janmashtami)भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष के अष्टमी तिथी को हुआ था|मथुरा नगरी के काराग्रह मे रात्री के 12 बजे उन्होने इस धरती पर अवतार लिया था|भगवान कृष्ण के अवतरण के पहले इस सृष्टी मे कई प्रकार के शुभ संकेत दिखाई दे रहे थे|तो आईये जानते है,श्रीकृष्ण जन्म के समय प्रकृति मे हुए शुभ बदलावों का वर्णन|

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भगवान इस जगत में अस्तित्व होने वाली सभी वस्तुओं के स्वामी है।भगवान इस प्रकृति के भी स्वामी है।प्रकृति को स्वयं भगवान ने बनाया है,इसलिए भगवान के आदेशों के अनुसार ही प्रकृति कार्य करती है।जब भगवान साक्षात इस धरती पर अवतार लेने वाले थे तब प्रकृति में कई प्रकार के बदलाव आए थे।उस समय समस्त प्रकृति में शुभ संकेत निर्माण हो रहे थे।(Shri Krishna Janmashtami)

जब भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का समय परिपक्व हुआ,तब नक्षत्रों का संयोग बहुत शुभ हो गया था। उस समय ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से रोहिणी नक्षत्र का बहुत प्रभाव था क्योंकि यह नक्षत्र बहुत ही पवित्र माना जाता है। रोहिणी नक्षत्र वास्तव में ब्रह्मा जी की देखरेख में काम करता है। नक्षत्रों के स्थिति के आधार पर अलग-अलग ग्रहों की अलग-अलग स्थिति के अनुसार शुभ और अशुभ समय होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय सभी नक्षत्रों की स्थिति शुभ थी।

भगवान श्रीकृष्ण जन्म के समय हर तरफ उत्साह और उल्लास का वातावरण था। सभी गांवों में,गौ के चराऊ मैदानोंमे,मानव मन में आनंद के संकेत थे। नदियाँ जल से भरी हुई थीं और सरोवर कमल से सुशोभित थे। जंगल सुंदर पक्षियों और मोरों से भरा हुआ था। जंगल के सभी पक्षी मधुर स्वर में गा रहे थे। मोर अपनी सहचरीयों के साथ नाच रहे थे। एक कोमल हवा चल रही थी और उसका सुखद स्पर्श मन को प्रसन्न कर रहा था।

अग्नि को आहुति देने वाले गृहस्थाश्रमी ब्राम्हणों को यज्ञकर्मों की वजह से एक सुखी गृहस्थ जीवन प्राप्त हुआ था। राक्षसों के व्यत्तय के कारण,ब्राह्मणों के घर में यज्ञकर्म बंद हो गए थे लेकिन अब उन्हें शांतिपूर्वक तरीके से यज्ञ प्रारंभ करने का अवसर मिला था। श्रीकृष्ण जन्म के समय स्वर्गलोक में गंधर्व और किन्नर भगवान के स्तुति हेतु विविध प्रकार के गीत गा रहे थे। चारण और सिद्ध लोग भगवान की सेवा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे फिर स्वर्ग में देवदूत अप्सराओं की संगति में अपनी पत्नियों के साथ नृत्य करने लगे।

महर्षि और देवता प्रसन्न हुए और फूलों की वर्षा करने लगे। समुद्र के किनारे पर सौम्य लहरों की आकर्षित करने वाली ध्वनियां चल रही थी और आकाश में बादल हर्ष से गरज रहे थे।(Shri Krishna Janmashtami)

जब इस प्रकार का संयोग एक साथ हुआ,तो उस रात के अंधेरे में भगवान विष्णु माता देवकी के सामने अपने दिव्य रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु की अभिव्यक्ति पूर्व की ओर आकाश में उगते हुए पूर्णिमा की तरह थी। संभव है कि यहां ऐसी आपत्ति उत्पन्न हो सकती है,की यदि कृष्ण पक्ष के अष्टमी के दिन भगवान कृष्ण का जन्म हुआ,तो उस समय चंद्र पूर्ण रूप से कैसे प्रकट हो सकते है।इस आपत्ति का उत्तर यह है कि भगवान कृष्ण का अवतरण चंद्र वंश में हुआ था और इसलिए भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से चंद्रदेव आकाश में पूर्ण रूप से प्रकट हो गए थे।

जानिए:- भगवान श्री कृष्ण के जन्म का वर्णन

This Post Has 3 Comments

  1. chaitanya

    usefull information

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