मीराबाई का जीवन परिचय – मीराबाई की कृष्णभक्ती

(मीरा बाई जीवन परिचय इन हिंदी);- आज हम जानेंगे मीराबाई का जीवन परिचय

भारत की इस पावन भूमि पर अनेक संत महात्मा होकर गए है। हमारी यह पवित्र भारतभूमी इसीके लिए जानी जाती हैं। पुराणों में लिखा है की देवता भी इस भूमि पर जन्म लेने के लिए तरसते हैं। आज हम बात करने वाले हैं परम कृष्णभक्त संत मीराबाई के चरित्र के उपर। संत मीराबाई एक उच्चकोटी की कृष्णभक्त थी। द्वापारयुग में श्रीकृष्ण इस धरती पर अपनी लीलाए प्रकट कर रहे थे तब उनके साथ जो गोपिकाए थी उसीमे से एक मीराबाई भी थी। पीछले जन्म में वो एक गोपी थी। कलयुग के मनुष्यों में भगवद्प्रेम जागृत करने के लिए भगवान के भक्त इस धरती पर आते जाते रहते हैं। संत मीराबाई उन्ही भक्तों मे से एक है। तो आइए जानते हैं संत मीराबाई का जीवन परिचय।

(मीराबाई का जीवन परिचय)-मीराबाई का जन्म और उनका परिवार –

हिंदी के कृष्णभक्त कवियों में संत मीराबाई का महत्वपूर्ण स्थान है। मीराबाई का जन्म स्थान मेडता माना जाता है| विद्वानों के अनुसार मीराबाई का जन्म राजस्थान के मेड़ता में सन 1498 में एक राज परिवार में हुआ था। मीराबाई के पिता का नाम रतनसिंह राठौड था| उनके पिता रतन सिंह राठौड़ राजपूत रियासत के शासक थे। मीराबाई के पति का नाम भोजराज था| मीराबाई अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। मीराबाई की माता का नाम वीरकुमारी था| जब वो छोटी थी तभी उनकी माता का निधन हो गया था।(मीराबाई का इतिहास)

मीराबाई का लालनपालन उनके दादा की देखरेख में हुआ जो भगवान विष्णु के गंभीर उपासक थे। और एक योद्धा होने के साथ-साथ भक्त हृदय भी थे। मीराबाई एक राजपुत घराणे से थी। उनके घराणे के सभी लोग धर्म का पालन करते थे। वह सब साधु एवं संतो की सेवा करते थे। मीराबाई के घर साधु संतों का आना-जाना लगा ही रहता था। इस प्रकार मीरा बचपन से ही साधु-संतों और धार्मिक लोगों के संपर्क में आती रही।(मीराबाई का जीवन परिचय)

मीराबाई का जीवन परिचय

मीराबाई का श्रीकृष्ण के प्रति बचपन का प्रेम –

मीरा का कृष्ण प्रेम- एक दिन मीराबाई के घर एक साधु आए थे। मीराबाई के घरवालों ने साधु को रहने के लिए अलग सी व्यवस्था की थी। उन्होने साधू को आराम करने के लिए एक कमरा दिया। साधु ने उस कमरे में अपने साथ लाई श्रीकृष्ण की सुंदर मुर्ती को स्थापित किया। साधु को वह मुर्ती उनके गुरू महाराज ने दि थी। एक दिन मीरा अपनी दादी मां के साथ साधु के कमरे में आई। मीरा ने साधु के पास ही वह कृष्ण मुर्ती देखी। जैसे ही मीरा ने वह कृष्ण मुर्ती देखी वैसे ही वह उस मुर्ती के निकट जाकर भगवान श्रीकृष्ण के उस सुंदर रूप को देखने लगी। मीराबाई को भगवान की वह मुर्ती बहुत अच्छी लगी।

मीराबाई ने साधु को भगवान श्रीकृष्ण की वह मुर्ती मांगी। साधु ने मीराबाई को वह मूर्ती देने के लिए मना कर दिया। तब मीराबाई बहुत ही दुखी हो गई। मीराबाई की आंखो से आंसुओ की धाराए बहने लगी। साधु ने यह दृश्य देखकर मन ही मन विचार किया की “मृत्यु के पहले कभी न कभी तो यह मूर्ती मुझे किसी को देनी पडेगी”। ऐसा विचार करते हुए और मीराबाई का भगवान के प्रती समर्पण देखते हुए साधु ने भगवान श्रीकृष्ण की मुर्ती मीराबाई को सौंप दी| भगवान श्रीकृष्ण की मुर्ती को पाकर मीराबाई को बहुत आनंद हुआ।(मीराबाई का जीवन परिचय)

जबसे मीराबाई को भगवान की वह मूर्ती मिली थी तबसे मीराबाई अपना सारा समय भगवान के पास ही बिताती। बादमे मीरा दिनभर भगवान के उस अर्चविग्रह की सेवा करने लगी। मीराबाई पुजापाठ करना,अर्चविग्रह को सजाना,अर्चविग्रह की देखभाल करना इत्यादी जैसे कर्म करने मे ही स्वयं को व्यस्त रखने लगी। मीरा कभी भगवान को कपडे सिलाती तो कभी उनके लिए गहने बनाती।(मीरा का कृष्ण प्रेम)

मन ही मन श्रीकृष्ण से विवाह –

(मीरा का कृष्णप्रेम)-एक दिन मीरा ने अपने महल के सामने से एक बारात जाती देखी। बारात में सजे हुए पती एवं पत्नी को देखकर मीरा ने अपनी माता से पुछा की “मां मेरा पती कोन हैं”? मीरा के इस कठिन प्रश्न का उत्तर देते हुए उनकी माता ने कहा की “तुम्हारे पती तो श्रीकृष्ण हैं”। फिर मीराबाई की माता वहासे चली गई,पर यह बात मीरा के मन में ऐसी बैठ गई की तबसे मीरा भगवान श्रीकृष्ण को हे अपना पती मानने लगी| जैसे जैसे मीराबाई की आयु बढती चली गई वैसे वैसे उनका कृष्णप्रेम और भी गहरा और दृढ होता गया। मीराबाई श्रीकृष्ण को सजाने के लिए दूर-दूर से फूल लाती,कभी उनके लिए भजन लिखती तो कभी मोरपंख ढूंढने जाती। जिसप्रकार कोई पतिव्रता स्त्री अपने पति की सेवा में कोई कसर नहीं छोडती उसीप्रकार ही मीरा भी श्रीकृष्ण की भक्ति में कोई कसर नही छोडती थी।(मीराबाई का जीवन परिचय)

(मीराबाई का जीवन परिचय)-मीराबाई का विवाह –

मीराबाई का विवाह- उन दिनों विवाह करने की उम्र बहुत कम हुआ करती थी। मीराबाई का विवाह 14 साल की उम्र मे हुआ था। एक दिन राणा संग्रामसिंह (राणा सांगा) की ओर से मीरा के विवाह के विषय में एक संदेश आया। उस संदेश में राणा सांगा ने मीराबाई के लिए अपने पुत्र कुंवर भोजराज का रिश्ता भेजा था। शीघ्र ही मीराबाई के दादाजी ने रिश्ते को मंजूरी दे दी। न चाहते हुए भी मीराबाई को विवाह के लिए तैयार होना पड़ा। अंत में कुंवर भोजराज के साथ मीराबाई का विवाह तय था| 1516 इसवी में राणा सांगा के पुत्र कुंवर भोजराज के साथ मीरा का विवाह संपन्न हुआ| मीराबाई कान्हा को गोद में बिठाए डोली में बैठ गई और मेवाड चली गई। भोजराज मीरा को बहुत पसंद करते थे। भोजराज की बहन उदा मीराबाई से थोडी नाराज रहती थी।

मीराबाई की रचनाएँ और उनसे झलकती उनकी कृष्णभक्ती –

मीरा ने विशिष्ट पदों की रचना की थी उनके पदों की अनेक टिकाए और संकलन बने मीराबाई के चार काव्य ग्रंथ माने जाते हैं।

मीराबाई की रचनाएँ और विशेषताए –

१.पहला है नरसी जी का मायरा

२.दूसरा है गीत गोविंद की टीका

३.अगला है ग्राम गोविंद की टीका

४.अगला है राग सोरठ

मीराबाई की भाषा शैली में राजस्थानी ब्रिज और गुजराती का मिश्रण है।

उनके साहित्य मे पंजाबी खड़ी बोली पूर्वी इन भाषाओं का भी मिश्रण मिलता है।

परंपरागत रूप से मीराबाई की कविताओं को पाड़ा कहा जाता है।

यह एक शब्द है जिसका उपयोग चौदहवी शताब्दी के प्रचार के द्वारा छोटे आध्यात्मिक गीतों के लिए किया जाता था।

मीराबाई की कविताओं में आमतौर पर एक सरल लय होती है। मीराबाई 16 वी शताब्दी की भक्ति धारा की संत थी जो भक्ति के द्वारा भगवान को प्राप्त करना चाहती थी। मीरा के काव्य में शांत रस की अभिव्यंचना हुई है| मीरा के पदों में सगुण भक्ति मुख्य रूप से मौजूद है लेकिन निर्गुण भक्ति का प्रभाव भी मिलता है।meerabaai biography in hindi

मीराबाई की पदावली –

१.इसके बाद मीरा पदावली मीरा की मलहार गरवा गीत यह भी मीराबाई की रचनाएं हैं।

२.मीरा के पद राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा में है।

३.श्रंगार के विपक्ष का चित्रण उनके पदों में बहुत मार्मिक है।

४.मीरा के पदों में प्रसाद और माधुरी गुणों की प्रचुरता है |

५.मीरा की कविता का प्रधान व सादगी और सरलता है।

६.मीरा की कविता के मूल में भगवान के प्रति छिपा उनका प्रेम है।

मीराबाई को भक्ति के तपोवन की शकुंतला और राजस्थान के मरुस्थल मंदाकिनी भी कहा जाता है। कोई चमत्कार दिखाने के लिए उन्होंने काव्य नहीं रचा,भगवान के प्रति अनन्य अनुराग उनके पदों में सहज रूप से व्यक्त हुआ है। मीराबाई की कविताओमें प्रेम की गंभीर अभिव्यंजना के साथ विरह की वेदना भी है और मिलन का उल्लास भी है|

ऐसी ढेरों कविताएं हैं जिन्हें मीराबाई द्वारा रचित माना जाता है। यह कविताएं भजन कहलाती है और उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय हैं। मीराबाई का संबंध भगवान कृष्ण के गुणगान में लिखी गई हजारों भक्ति पर कविता ओं से जोड़ा जाता है। मीराबाई पर अनेक भक्ति संप्रदाय का प्रभाव था इसका चित्रण मीराबाई की रचनाओं में दिखता है। पदावली यह मीराबाई की एकमात्र प्रमाण काव्यकृत है। मीराबाई की लेखन रचनाएं आध्यात्मिक और प्रेम संबंधी दोनों थी।(मीराबाई का जीवन परिचय)

मीराबाई का जीवन परिचय

(मीराबाई का जीवन परिचय)-मीराबाई की कृष्णभक्ति –

बचपन से ही मीरा भगवान कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम रखती थी। उन्हें ही अपना प्रिय और पति मानती थी मीरा के गुरु संत कवि रिहदास थे। मीरा की भक्ति कांता माधुरी और दांपत्य भाव की मानी जाती है। मीरा की भक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती थी। मीराबाई मंदिरों में जाकर वहां मौजूद कृष्ण भक्तों के सामने कृष्ण जी की मूर्ति के आगे भजन-कीर्तन करती रहती थी। मीराबाई का कृष्ण भक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगता था। मीराबाई भगवान कृष्ण को ही अपना पति मान कर उनकी उपासना करती थी। उनके लिए संसार में भगवान कृष्ण के अतिरिक्त दूसरा पुरुष अस्तित्व में ही नहीं था।

मीरा को यह दृढ़ विश्वास था की अपने पिछले जन्म में वो वृंदावन की गोपियों में से एक थी। मीराबाई सदा श्री कृष्ण के प्रेम में व्याकुल रहती थी। उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपने भगवान के साथ आध्यात्मिक और शारीरिक मिलन था। मीराबाई ने लोक लाज और कुल की मर्यादा के नाम पर लगाए गए सामाजिक और वैचारिक बंधनों का हमेशा विरोध किया है। मीराबाई ने कभी मंदिर में सार्वजनिक रूप से गाने में कभी हिचक महसूस नहीं की। मीरा मानती थी कि महापुरुषों के साथ संवाद जिससे सत्संग कहा जाता है उससे ज्ञान प्राप्त होता है। उस युग मैं जहा रूढ़ियाओ से ग्रस्त समाज का दबदबा था वहा मीराबाई अपनी कृष्णभक्ति में लीन थी।(मीराबाई का जीवन परिचय)

मीराबाई के जीवन का अंतिम समय –

एक दिन मंदिर में मीराबाई कृष्णभक्ति में लीन थी। तभी वहापर भैस बदलकर अकबर और बीरबल आए थे। बिरबल ने श्रीकृष्ण के लिए एक हार लाया था। मीरा की भक्ति और उनकी अद्भुत संगीत वाणी को दिखाने के लिए बीरबल अकबर को वहा ले आया था।(मीराबाई का जीवन परिचय)

एक दिन जब भोजराज घर आए तो घर पर बड़ा ही तणाव का वातावरण था। राणा सांगा बहुत क्रोध में थे। उदा जो की भोजराज की बहन थी,उसने राणा सांगा को मीराबाई के विरूद्ध गलत-सलत बातें बताई थी। उसने राणा को बताया की “पीछले कुछ दिनों मे मीरा ने देश की सीमा के बाहर एक संदेश भेजा हैं और मीरा ने वो संदेश मुघलो को भेजा है”। उसी समय राणा सांगा ने मीरा की बिरबल के साथ मंदिर मे हुई उस आकस्मिक भेट के चर्चे भी सुने थें| उदा की इस बातों में आकर राणा सांगा ने मीराबाई को देशद्रोही घोषित किया गया। राज्य की सभा ने और राजा ने देशद्रोही होने के नाते मीराबाई को मृत्युदंड देने का निर्णय लिया।

(मीराबाई का जीवन परिचय) भोजराज जो की मीराबाई के पती थे,उन्हे भी पता था की मीराबाई ने कोई देशद्रोह नही किया था| मीराबाई ने भोजराज को बताया था की उन्होने वो खत परमपूज्य श्री तुलसीदास महाराज को भेजा था| राज्य के कई लोग और भोजराज को छोडकर उनका पुरा परिवार मीरा से पहले ही नाराज था| उनको मीरा का मंदिर मे नाचना और गाना अच्चा नही लगता था| इन सब कारणो की वजह से कोई मीराबाई की बात सुन ही नही रहा था| मीराबाई को मृत्युदंड से बचाने के लिए भोजराज ने गुप्त रूप से अनेक प्रयास किए फिर भी वो सफल नहीं हुए। भोजराज मीरा से अत्यंत प्रेम करते थे। मीराबाई भी उनके प्रेम का सम्मान करती थी।

(मीराबाई का जीवन परिचय)-मीराबाई का कृष्णमिलन –

मीराबाई का जीवन परिचय

अगले दिन वैसा ही हुआ जो तय था। मीराबाई सारी प्रजा के सामने सभा के बीच खडी हो गयी। मीराबाई को अब मृत्युदंड देना था। मीराबाई के हाथों में एक वीश का प्याला दिया गया। मीराबाई ने बिना किसी प्रतिवाद के वो पूरा प्याला पी लीया। परंतु भगवान की कृपा से मीराबाई के शरीर पर उस वीश का कोई प्रभाव पड़ा ही नही।

उसके ठीक बाद,फिर मीराबाई उस मंदिर में गई जिस मे वो हररोज जाया करती थी| मीराबाई को मंदिर मे जाते तो सबने देखा। कुछ समय बाद मंदिर से मधुर आवाज आने लगी वो ऐसी थी “मेरे तो गिरीधर गोपाल दुसरों ना कोई,जाके सर मोर मुकुट मेरो पती सोई,मेरे तो गिरधर गोपाल दुसरो ना कोई”। इसके बाद लोगो ने मीरा को मंदिर से आते हुये देखा ही नही,फिर लोगोने मंदिर मे देखा तो सब लोग बडे आश्चर्य चकित हो उठे। मीरा को मंदिर मे जाते हुये तो सबने देखा था पर अब मीरा वहां थी ही नही| वहा के लोगो णे ऐसा मान लिया की मीरा बाई की मृत्यू हो गई है| यह बात किसी चमत्कार से कम नही थी। साक्षात भगवान श्रीकृष्ण मीरा को अपने धाम ले जाने के लिये मंदिर मे आये थे|(मीराबाई का जीवन परिचय)

मीराबाई का जन्म कहां और कब हुआ था?

मीराबाई का जन्म 1498 को राजस्थान के मेडता मे वैशाख मास मे हुआ था| मीराबाई का जन्म एक राजपरिवार मे हुआ था|

मीराबाई पिछले जन्म में कोन थी?

मीराबाई पिछले जन्म मे एक गोपी थी| जब भगवान श्री कृष्ण इस धरती पर अपनी लिलाए प्रकट कर राहे थे तब उनके साथ जो गोपिया थी,उन्ही मे से एक मीराबाई भी थी|

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