महाशिवरात्रि कब है ? जानिए महाशिवरात्री का महत्व और कथा

आज हम जानेंगे महाशिवरात्रि कब है,महाशिवरात्री का महत्व,महाशिवरात्री की कथा और महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है|

महाशिवरात्रि कब है? –

2022 मे महाशिवरात्री की शुभ तिथी १ मार्च मंगलवार को है|

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महाशिवरात्रि कब है

महाशिवरात्री का महत्व –

पुराणों मे महाशिवरात्री के व्रत का महत्व वर्णित है।

१.महाशिवरात्री के सिद्ध मुहुर्त मे शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित स्थापित करने से व्यवसाय मे वृद्धी और नौकरी मे तरक्की मिलती है।

२.महाशिवरात्री के दिन महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से व्रती को अच्छा स्वास्थ प्राप्त होता है।

३.महाशिवरात्री के दिन भगवान शिव की आराधना करने से लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के फलों की प्राप्ती होती है।

४.महाशिवरात्री के दिन व्रत करके रात्री मे भगवान शिव के पांच बार दर्शन पूजन करने से समस्त प्रकार के सुखों की प्राप्ती होती है।

५.इस दिन शिवलिंग पर जल चढाने अथवा दूध की धारा से अभिषेक करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते है।

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है –

यह कथा रामचरितमानस और श्रीमद्भागवत पुराण में मिलती है।(shivratri 2022)

इस कथा के अनुसार एक बार शिव जी और सतीजी कही जा रहे थे तभी उन्होंने दंडकारण्य में श्रीराम और लक्ष्मण जी को देखा। श्रीराम देवी सीता को ढूंढ रहे थे। तभी भगवान शंकर जी ने उन्हें प्रणाम किया और माता सती को भ्रम हो गया कि ऐसा कैसे हो सकता है,कि निराकार भगवान साकार हो जाए और साकार हो भी गए तो अपनी स्त्री को ढूंढ रहे है।(महाशिवरात्री का महत्व) वह तो सर्वज्ञ है सर्वांतर्यामी है उनको मालूम होना चाहिए उनकी पत्नी कहां है। इसके बाद भगवान शिव माता सती को समझाते हैं परंतु माता सती नही मानती। उसके बाद भगवान शिव जी सती जी से कहते हैं जाओ परीक्षा ले लो। शिवजी जब परीक्षा देने को कहते हैं तो मां सती सीता जी का भेष धारण करके जा कर बैठ जाती हैं। महाशिवरात्रि कब है)

मन ही मन सती माता का त्याग –

तभी रामजी उन्हें तुरंत पहचान लेते है और कहते हैं कि माताजी पिताजी किधर है ? ऐसा देखकर माता सती को और भ्रम हो जाता हैं। जब माता सती वापस आती हैं तब शिवजी से और झूठ बोल देती है कि मैंने श्रीराम जी की परीक्षा नहीं ली। लेकिन शिवजी अंतर्यामी हैं इसलिए वह जान गए कि यह मेरी माता सीता का वेश धारण करके गई थी परीक्षा लेने के लिए। अतः भगवान शिवजी ने सोचा की इन्होंने मेरी माता का वेश धारण किया हैं इस जन्म में तो इनके साथ पति पत्नी का रिश्ता नहीं रह सकता। इसलिए शिवजी अपने मन ही मन में सती को त्याग दिया। बाद में सती जी को यह शंका हो ही गई थी कि शिव जी ने मुझे मन ही मन त्याग दिया हैं।

भगवान शिव का अपमान और सती जी की मृत्यू –

एक दिन जब तक सतीजी के पिता यज्ञ करवा रहे थे तब उनके पिता दक्ष ने शिवजी को नहीं बुलाया था। तब सती जी जिद करने लग गई शंकर जी से कि मैं भी जाऊंगी तो शंकर जी ने उन्हें कहा कि ठीक है जाओ। शिवजी ने सतीजी को गणों को साथ भेजा। सती जी जब वहां पर गई वहां पर उनकी बहनों ने उनके साथ ज्यादा बातचीत नहीं की। लेकिन मां ने उनका आदर सत्कार किया। जब सती जी यज्ञ में जाती हैं तो देखते हैं कि,वहां पर शिव जी का आसन नहीं बिठाया गया।(महाशिवरात्री का महत्व) अपने पति का अपमान समझकर वहीं पर अपने आप को योग अग्नि में भस्म कर लेती हैं।(shivratri 2022)

इसके बाद फिर स्वयं भगवान श्रीराम जी ने शिवजी जी के पास जाकर उन्होंने कहा था कि जब विवाह का प्रस्ताव आएगा तो आप हां कर दीजिएगा। फिर बाद में यही सती जी मां पार्वती का अवतार लेकर आई। उसके बाद मां पार्वती की परीक्षा ली जाती हैं। तो माता पार्वती जी कहती है कि मैं या तो शिवजी से शादी करूंगी नहीं तो अनंत काल तक कुंवारी रहूंगी। इसके बाद शिवजी का विवाह पार्वती माता से होता हैं। और जिस दिन माता पार्वती और शिवजी का विवाह हुआ वह महाशिवरात्रि का ही दिन था।

शिवरात्रि कब है

महाशिवरात्री की कथा –

कुछ विद्वानों के अनुसार शिवरात्री के दिन ही भगवान शिव ने विष पिया था। हलाहल विष जो की समुद्र मंथन के समय समुद्र से निकला था।(महाशिवरात्रि कब है)आयीए जानते है शिवपुराण मे वर्णित महाशिवरात्री की कथा| कथा को पढते-पढते ही आपको महाशिवरात्री का महत्व समज आएगा |(शिवरात्रि की कहानी)

शिवपुराण मे वर्णित कथा (महाशिवरात्री का महत्व) –

शिवपुराण के कोटी रूद्र संहिता मे वर्णित कथा के अनुसार पौराणिक काल मे किसी वन में एक भील रहता था।(महाशिवरात्री का महत्व)उस भिल का नाम कुरदृह था। वह तामसिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। वह भील बलवान भी था और उसके साथ-साथ वह क्रुरता पूर्ण कर्म भी करता था। वह प्रतिदिन वन मे जाकर हिरण और अन्य जानवरों को मारता और वही रहकर नाना प्रकार की चोरिया किया करता था। उसने बचपन से ही कोई शुभ कर्म नही किया था। उसे शुभ कर्म,अच्छे विचार,पुण्यकर्म इनके बारे मे कुछ ज्ञान नही था। उसे क्या करना चाहिए,कैसे करना चाहिए,क्यो करना चाहिए, उसे इसके बारे मे कुछ नही पता था क्योकि वह तमोगुण के सघन जंगल मे जो फंस गया था। वह और उसके माता-पिता और पत्नी ऐसे ही जीवनयापन कर रहे थे। (महाशिवरात्रि कब है)

भौतिक संसार की आसक्ती –

(महाशिवरात्री का महत्व) एक दिन उस भील के माता-पिता भुक से व्याकुल हो गए थे और वह उसके पास खाने की मांग कर रहे थे। उनके बार-बार याचना करने के बाद वह हाथ मे धनुष और बाण थामे वन की और निकल पडा। उस दिन वह हिरण का शिकार करने के लिए दिनभर जंगल मे घुमा पर फिर भी उसके साथ कुछ नही लगा। वह सोचने लगा की अगर आज मै अपने परिवारजनों को खाना नही दे पाऊंगा तो वो भुक से कमजोर हो जाएंगे। उसने हिम्मत नही हारी,वह एक बडे जलाशय के समीप पहुंचा और उस जलाशय के किनारे बैठ गया। जलाशय मे प्रतिदिन कई प्राणी अपनी प्यास बुझाने आते थे। इसलिए वह भील जलाशय के किनारे के एक बेल के पेड पर जाकर शिकार पर ताक लगाए बैठ गया। वह शिकार के लिए बहुत लालायित हो उठा था क्योकि उसे भी बहन भूक लगी थी।

भौतिक आसक्ती हमारी बुद्धि के ज्ञान को नष्ट करती है और हमे मोहरुपी घने जंगल मे फंसाती है|

– भगवतगीता

प्रथम प्रहर की पूजा –

धीरे-धीरे रात्री का समय होने लगा था। फिर रात का पहला प्रहर प्रारंभ हुआ। वह भील शिकार की प्रतिक्षा करते करते बेल का एक-एक पत्ता तोडकर नीचे डाल रहा था। बेल के पेड के ठीक नीचे एक शिवलिंग था। वह भील लगातार बेलपत्र तोडकर शिवलिंग पर डाल रहा था,उसने तोडकर फेंके हुए बेलपत्र ठीक शिवलिंग पर जाकर स्थापित हो रहे थे। इसप्रकार से शिवरात्री के दिन ही भील के हाथों से रात्री के प्रथम प्रहर की पुजा समाप्त हो गई। न जानते हुए संपन्न हुई उस पुजा से भील का बहुत सारा पाप नष्ट हो गया। (महाशिवरात्रि कब है)

अनजाने मे हुई भगवान की अल्प भक्ती भी मनुष्य को मोक्ष प्राप्ती के मार्ग पर ले आती है|

उसी वक्त जलाशय मे पानी पीने के लिए एक हिरणी आई। भील ने हिरणी पर निशाना लगाया।(महाशिवरात्री का महत्व) तभी हिरणी ने पेड के उपर बैठे भील को देखकर हिरणी ने भील से कहा की “हे शिकारी कृपा करके मेरे ऊपर बाण मत चलाओ” तभी भील बोला की “मेरे परिवार के सदस्य और स्वयं मै बहुत भुका हू,अब मै तुम्हे मारकर मेरी और मेरे परिवारजनों की क्षुधा को तृप्त करूंगा”। दया-याचना करते हुए हिरणी ने कहा की “इस समय मेरे बच्चे जंगल मे अकेले है,मै उनको पोषन करके फिर आउंगी, तब तुम मुझे मार देना”। हिरण के ऐसा कहने पर भी भील को दया नही आई। भील ने हिरणी को मारने का निश्चय किया कर ही लिया था। पर फिर बादमें उस हिरणी ने अनेकों शपथ और तर्क प्रस्तुत किए जिसके चलते भील मान गया। पानी पीकर वह हिरणी जंगल मे चली गई।

द्वितीय प्रहर की पूजा (महाशिवरात्री का महत्व)-

इतने मे रात्री का पहला प्रहर भील के जागते जागते ही बीत गया। भील ने सोचा की दुसरी हिरणी लौटकर आने मे अभी बहुत समय है इसलिए तबतक दुसरे शिकार की प्रतीक्षा करते है। वह भील पुनः बेल के पेड पर जाकर दुसरे शिकार की प्रतीक्षा करने लगा,पुनः वह वैसा ही करने लगा जैसा पहली बार कर रहा था। भील बेलपत्र तोडकर नीचे फेंक रहा था और वो बेलपत्र सीधे शिवलिंग पर जाकर गिर रहे थे। ऐसा करते-करते उसकी दूसरे प्रहर की पुजा भी संम्पन्न हुई। (महाशिवरात्रि कब है)

दुसरी हिरनी का आना –

(महाशिवरात्री का महत्व) इतने मे ही उस हिरनी की बहन दूसरी हिरनी जिसका पहली ने स्मरण किया था वह भी जल पीने के लिए वहा आ गई। उसे देखकर भील ने बाण को खींचा और कहा कि मेरा परिवार भूखा है मैं उन्हें खाना देने के लिए यह सब कर रहा हूं। यह सुनकर वह हिरनी बोली मेरा देह धारण सफल हो गया क्योंकि यह अनित्य शरीर के द्वारा उपकार होगा। परंतु मेरे छोटे-छोटे बच्चे घर में है अतः मैं एक बार जाकर उन्हें अपने स्वामी को सौंप दुंगी और फिर तुम्हारे पास वापस आऊंगी। हिरनी की बात सुनकर भील बोले मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं है। मैं तुम्हें मारूंगा इसमें संशय नहीं है।

स्वाभिमानी मनुष्य ने लिया हुआ वचन ही उसका कर्तव्य होता है|

भील की बातें सुनकर हिरनी भगवान विष्णु की शपथ खाती हुई बोली शिकारी जो कुछ मैं कहती हूं उसे सुनो यदि मैं लौट कर ना आऊं तो अपना सारा पुण्य हार जाऊ। जो वचन देकर उससे पलट जाता है वह अपने पुण्य को हार जाता है। जो पुरुष अपनी विवाहिता स्त्री को छोड़ कर दूसरी के पास जाता है। वैदिक धर्म का उल्लंघन करके कपोल कल्पित धर्म पर चलता है। भगवान विष्णु का भक्त होकर शिव की निंदा करता है। माता पिता के निधन तिथि को श्राद्ध आदि ना करके उसे सुना बिता देता है तथा मन में संताप का अनुभव करके अपने दिए हुए वचन को पूरा करता है। ऐसे लोगों को जो पाप लगता है वही मुझे भी लगे यदि मैं लौट कर ना आऊ। हीरनी के ऐसा कहने पर भील ने कहा जाओ। उसके बाद जल पीकर हर्ष पूर्वक हिरनी अपने आश्रम को गई।

तिसरे प्रहर की पूजा –

(महाशिवरात्री का महत्व) इतने मे ही रात्री का भी तीसरा प्रहर प्रारंभ भी हो गया। परंतु हिरनी के लौटने मैं बहुत विलंब हुआ। हिरणी के आने तक वह फिर से उस बेल के पेड पर चढकर बेलपत्र तोडकर नीचे फेंकने लगा। इतने में ही उसने जल के मार्ग में एक हिरण को देखा। वह बड़ा हष्ट पुष्ट था उसे देखकर भील को बड़ा हर्ष हुआ। और वह धनुष पर बाण रखकर उसे मारने के लिए तैयार हो गया। ऐसा करते समय उसके प्रारब्धवश कुछ जल और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे और भगवान शिव की तीसरे प्रहर की पूजा भी संपन्न हो गई। (महाशिवरात्रि कब है)

इस तरह भगवान ने उस पर अपनी दया दिखाई। पत्तों के गिरने की आवाज सुनकर उस हिरण ने भील की ओर देखा। फिर भील बोला की मै अपने कुटुंब को भोजन देने के लिए तुम्हारा वध करूंगा। उसकी बात सुनकर हिरण के मन में बड़ा हर्ष हुआ और तुरंत ही बोला मैं धन्य हूं मेरा हष्ट पुष्ट शरीर होना सफल हो गया। क्योंकि मेरे शरीर से आप लोगों की तृप्ति होगी जिसका शरीर परोपकार के काम में नहीं आता उसका सब कुछ चला जाता हैं। जो सामर्थ्य रहते हुए भी किसी का उपकार नहीं करता उसका वह सामर्थ्य व्यर्थ चला जाता है। तथा वह परलोक में रूप में नर्क गामी होता है। परंतु एक बार मुझे जाने दो। मैं अपने बालको को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सब को धीरज बनाकर आऊंगा।

महाशिवरात्री का महत्व

भिल का मन परिवर्तन (महाशिवरात्री का महत्व)-

उसके ऐसा कहने पर भील मन ही मन बड़ा विस्मित हुआ उसका हृदय शुद्ध हो गया। उसके सारे पाप नष्ट हो चुके थे इसलिए उसके अंतकरण मे दया उत्पन्न हुई। उसने हिरन से कहा जो यहां आए वह सब तुम्हारी तरह बातें बना कर चले गए परंतु वे अभी तक यहां नहीं लौटे। हिरन तुम भी इस समय संकट में हो इसलिए झूठ बोल कर चले जाओगे तो फिर आज मेरा जीवन निर्वाह कैसे होगा। भील की बातें सुनकर हिरण बोला शिकारी में जो कुछ कहता हूं उसे सुनो मैं जो कह रहा हूं वह असत्य नहीं है। सारा चराचर ब्रह्मांड सत्य शब्द से ही टिका हुआ है। जिसकी वाणी झूठी होती है उसका पुण्य नष्ट हो जाता है तथा तुम मेरी सच्ची प्रतिज्ञा सुनो संध्या काल में मैथुन तथा शिवरात्रि के दिन भोजन करने से जो पाप लगता है,झूठी गवाही देनेधरोहर को हड़प लेने से जो पाप लगता है वही पाप मुझे भी लगे यदि मैं लौट कर ना आऊ।

समर्पण का उत्तम उदाहरण –

(महाशिवरात्री का महत्व) उसकी बात सुनकर भील ने कहा जाओ शीघ्र लौटना भील के ऐसा कहने पर हिरण पानी पीकर चला गया। वे सब अपने आश्रम पर मिले, तीनों ही प्रतिज्ञाबद्ध हो चुके थे आपस एक दूसरे से वृतांत को सुनकर सब ने यह निश्चय किया कि वहा अवश्य जाना चाहिए। निश्चय के बाद वह बालकों को आश्वासन देकर वे सब के सब जाने के लिए उत्सुक हो गए। उस समय पहले हिरनी ने अपने स्वामी से कहा स्वामी आपके बिना यह बालक कैसे रहेंगे प्रभु मैं नहीं वहां पहले जाकर प्रतिज्ञा की है, इसलिए केवल मुझको जाना चाहिए। आप दोनों यहीं रहिए उसकी यह बात सुनकर छोटी हिरनी बोली बहन मैं तुम्हारी सेविका हूं इसलिए आज मैं शिकारी के पास जाति हू। यह सुनकर हिरण बोले मैं ही वहां जाता हूं तुम दोनों यहां रहो क्योंकि बच्चों की रक्षा माता से ही होती है। (महाशिवरात्रि कब है)

स्वामी की यह बात सुनकर दोनों हिरनी बोली प्रभु पति के बिना जीवन को धिक्कार है। तब उन सब ने अपने बच्चों को सांत्वना देकर उस स्थान को प्रस्थान किया जहां वह भील उनकी प्रतीक्षा में बैठा था। उन्हें जाते देख उनके सब बच्चे पीछे पीछे चले आए। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि माता-पिता की जो गति होगी वही हमारी भी हो। और सब को एक साथ आया हुआ देख भील बड़ा हर्ष हुआ। उनके आने तक वह भील बेल के पेड पर बैठ कर बेलपत्र तोडकर रहा था। तभी उसकी चौथे प्रहर की पुजा भी सम्पन्न हुई। उस समय भील का सारा पाप तत्काल भस्म हो गया।

भिल को हुई ज्ञानप्राप्ती (महाशिवरात्री का महत्व)-

बिना फल की इच्छा से की हुई भक्ती से मनुष्य को ज्ञान प्राप्त होता है|

(महाशिवरात्री का महत्व) इतने में ही सारे हिरण आकर बोले,शिकारी शीघ्र कृपा करके हमारे शरीर को सार्थक करो। उनकी बात सुनकर भील को बड़ा विस्मय हुआ। शिव पूजा के प्रभाव से उसको दुर्लभ ज्ञान प्राप्त हो गया। उसने सोचा यह हिरण ज्ञानहीन पशु होने पर भी धन्य है ,जो ज्ञान हीन होकर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं। लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्य से अपने परिवार का पालन करता रहा। अब उसने अपने बाण रोक लिए तथा उन्ह हिरणों से कहा कि वे सब धन्य है तथा उन्हें वापस जाने दिया। उसके साथ करने पर भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर तत्काल उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया तथा उसे सुख समृद्धि का वरदान देकर गुहु नाम प्रदान किया।

यह वही गुहू था जिसके साथ भगवान श्री राम ने मित्रता की थी। इसप्रकार महाशिवरात्री की कथा सम्पन्न हुई।

महाशिवरात्रि कब है ?

2022 मे महाशिवरात्री की शुभ तिथी १ मार्च मंगलवार को है|

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महाशिवरात्रीच्या शुभेच्छा मराठी

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