सफला एकादशी 2021-व्रत का महत्व,पूजा विधी और पौराणिक कथा

(सफला एकादशी व्रत कब है?)वर्ष 2021 मे सफला एकादशी व्रत की शुभ तिथी 30 दिन गुरुवार को है|

सफला एकादशी 2021

सफला एकादशी का महत्व –

यह व्रत पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है।इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पुजा का विधान है।(सफला एकादशी का महत्व)इस व्रत को करने से समस्त कार्यों में अवश्य ही सफलता मिलती है।इसलिए इसका नाम सफला एकादशी है।जिसप्रकार शेषनाग,नागों मे श्रेष्ठ है और गंगा समस्त नदियों मे श्रेष्ठ है उसीप्रकार सारे एकादशी व्रतों मे यह सफला एकादशी का व्रत श्रेष्ठ है।जो फल मनुष्य को पांच हजार वर्षों का तप करके मिलता है,वो इस एकादशी व्रत की रात्रि में जागरण करके मिलता है।इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को सद्गती प्राप्त होती है।सफला एकादशी के महात्म्य की चर्चा पुराणों मे कि गई है।(सफला एकादशी 2021)

सफला एकादशी व्रत की पुजा विधी –

यह व्रत पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है।ग्रहस्थाश्रमी लोक भी इस एकादशी व्रत का पालन कर सकते है।सफला एकादशी व्रत की विधि-

सफला एकादशी व्रत ऐस करें

१.एकादशी के दिन ब्रम्हमुहूर्त मे उठकर स्नान करना चाहिए।

२.स्नान से शरीर पवित्र हो जाता है स्नान करने के बाद ही भगवान की सेवा आरंभ करनी चाहिए।

३.धूप,चंदन,पुष्प,तुलसीदल से भगवान की पुजा करनी चाहिए क्योंकी इन चीजों से वातावरण पवित्र और प्रसन्न हो जाता है।

४.भगवान के नामों का जाप करना चाहिए(हरे कृष्ण महामंत्र)।

५.भक्तों मे प्रशाद का वितरण करना चाहिए।

६.आत्मसाक्षात्कारी ब्राम्हणों को दान और प्रशाद देना चाहिए।

७.सफला एकादशी के दिन फलाहार करके उपवास करना चाहिए।

सफला एकादशी की कथा –

सफला एकादशी व्रत की कथा का उल्लेख पद्म पुराण में हुआ है।प्राचीन समय की बात है,महिष्मत नाम का एक राजा चंपावती नामक नगरी मे राज करता था।महिष्मत एक धर्मात्मा राजा था।उसके पांच पुत्र थे।उन पांच पुत्रों मे से सबसे बडे पुत्र का नाम लुंपक था।लुंपक बडा ही पापी और दुराचारि था।वह व्याभिचार करता था,चोरी करता,मदिरापान भी करता था।इन बुरी आदतों में फँसकर उसने अपने पिता की बहुत संपत्ती नष्ट की थी।वो सदा ब्राम्हणों की निंदा करता था और कुसंग मे लिप्त रहता था।राजा उसके ऐसे कार्यों से त्रस्त होकर उसे राज्य से बाहर निकालता है।(सफला एकादशी व्रत कथा)

उसके बाद लुंपक जंगल मे जाकर एक पीपल वृक्ष के नीचे झोपड़ी बनाकर वहा रहने लगा।लुंपक जंगल मे जाकर भी दुष्कर्म करता था।एक दिन पौष मास की दशमी को जंगल मे बहुत ठंड पडती है,लुंपक उस ठंड को सहन नहीं कर पाता और रातभर भूका रहने के कारण वो बेहोश हो जाता है।जिस दिन वो बेहोश हो गया था सी दिन सफला एकादशी थी।जब उसे होश आया तब उसने कुछ फल बटोरकर लाए और उन्हें पीपल के वृक्ष के नीचे रख दिया।उसके बाद उसे अपने दुष्कर्मो का पश्चाताप होने लगा और वो उस अवस्था मे ही मन से भगवान से प्रार्थना करना लगा।उसकी प्रार्थना के प्रभाव से भगवान ने उसके जागरण को व्रत का जागरण माना और उसने पीपल वृक्ष के नीचे रखे फलों को एकादशी की पुजा मानकर सफला एकादशी का पुण्यफल उसे दिया।(सफला एकादशी व्रत की कथा)

सफला एकादशी के पुण्य फल से उसे पुनः राजयोग प्राप्त हुआ और फिर राजा ने उसे राज्य का अधिकार दे दिया।फिर वो जीवन भर भगवान की सेवा करता रहा और वृद्धावस्था में मृत्यु होने के पश्चात् उसे विष्णुलोक प्राप्त हुआ।(सफला एकादशी 2021)

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