मोहिनी एकादशी व्रत – महत्व,पूजन विधी,पौराणिक कथा

मोहिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि

मोहिनी एकादशी व्रत का महत्व-

अयोध्या में रहते हुए एक बार श्रीराम ने महर्षि वसिष्ठ से कहा कि मैं सब व्रतों में श्रेष्ठ व्रत को सुनना चाहता हूं। जिससे सब पाप नष्ट हो जाते हों और वह सब दुखों को काटता भी हो।तब वसिष्ठ ने कहा(मोहिनी एकादशी महात्म्य)कि यह एकादशी सब पापों का विनाश करती है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोहजाल और पापों के समूह से अवश्य मुक्त हो जाता है। इसलिए आप इस पापनाशिनी और दुखहारिणी एकादशी का व्रत अवश्य करें।

मोहिनी एकादशी व्रत रखने से क्या फल मिलता है-

इस व्रत की कथा को एकाग्रचित्त होकर सुनने से मनुष्य के पाप धुल जाते हैं।(मोहिनी एकादशी का फल)कथा वाचन और श्रवण करने से सहस्र गोदान का फल मिलता है। यह सब जानकर भगवान् श्रीराम ने सीताजी की खोज करते समय इस व्रत को किया था। श्रीकृष्ण भगवान् के कहने पर युधिष्ठिर ने और मुनि कौण्डिन्य के कहने पर धृष्टबुद्धि ने भी इसे किया था। इस प्रकार इस व्रत को करने से व्रती की समस्त मनोकामनाएं तो पूरी होती ही हैं, मन को शांति पहुंचाने और निंदित कर्मों को छोड़कर सत्कर्म करने की शक्ति भी प्राप्त होती है। तीर्थ दान तथा यज्ञ आदि से भी बढ़कर इसका माहात्म्य शास्त्रों में वर्णित है।

मोहिनी एकादशी व्रत कैसे करे ? (पूजन विधी-विधान )

मोहिनी एकादशी का व्रत वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है।(मोहिनी एकादशी व्रत की पूजा कैसे करे?)इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम की पूजा-अर्चना करने का विधान है। व्रती को स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान् श्रीराम की प्रतिमा को दूध, जल से स्नान कराकर, श्वेत वस्त्र पहनाना चाहिए। फिर उच्चासन पर बैठाकर रोली व चंदन से तिलक लगाकर श्वेत पुष्पों की माला पहनाएं। धूप-दीप जलाकर आरती उतारें।(मोहिनी एकादशी व्रत की पूजा विधी)तत्पश्चात् पंचमेवा एवं मीठे फलों का भोग लगाकर उसको भक्तों में बांटें।ब्राह्मणो को भोजन कराकर उन्हें श्वेत वस्त्रों का दान करें। रात्रि में भक्तों के साथ मिलकर भगवान् श्रीराम का भजन-कीर्तन कर प्रसाद वितरित करें।(मोहिनी एकादशी मंत्र)

मोहिनी एकादशी व्रत की कथा –

इस व्रत की कथा का उल्लेख श्री पद्म पुराण में इस प्रकार मिलता है-(मोहिनी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा)प्राचीन काल में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नामक एक सुंदर नगरी में द्यूतिमान नामक एक राजा राज करता था। इसी राज्य में धनपाल नामक एक पुण्यात्मा सेठ भी रहता था। वह सदा धार्मिक स्थलों का निर्माण करने और शुभ कर्म करने में व्यस्त रहता था। उसके पांच लड़के थे उसमें दृष्ट बुद्धि नामक पुत्र महापापी था। वह सदा ही दुष्कर्म करने में लिप्त रहता था। वह कभी भी भगवान की पूजा नहीं करता था।

मांस, मदिरा का सेवन करना, पिता की संपत्ति नष्ट करना उसका शौक था। उसके दुष्कर्म से परेशान होकर उसके पिता ने और बंधुओं ने उसे घर से निकाल दिया था। वह अब पूरी तरह से निर्धन हो गया था। वह चिंता में पड़ गया कि अब क्या करूं और कहा जाऊ? अपने पेट की भूख मिटाने के लिए वह चोरी और निकृष्ट कार्य करने लगा।वह बार-बार पकड़ा जाता था,काराग्रह में जाता था,मार खाता था लेकिन अपनी गंदी आदतें नहीं छोड़ता था। परेशान होकर उससे देश से निकाला गया और वह जंगल में जाकर रहने लगा। जंगल में वह मांस खाकर जीवित रहने लगा।

इसी प्रकार वह पाप के कीचड़ में फंस गया था। एक दिन किसी के कहने पर वह कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम में जा पहुंचा। वह ऋषि ने गंगा स्नान किए हुए भीगे वस्त्रों की एक बूंद दृष्टबुद्धि पर पड़ी तो वह शुद्ध हो गया।उसने ऋषि से पूछा कि अपने सारे पापोको बिना धन के प्रायश्चित करने का उपाय बताइए और ऋषि ने कहा तुम मोहिनी एकादशी का व्रत करो। इस व्रत को करने से सुमेर पर्वत के समान बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। कौण्डिन्य ऋषि ने कहा वैसे दृष्टबुद्धि ने व्रत किया और उसके सारे पाप नष्ट हो गए और वो शुद्ध देह धारण कर श्री विष्णु के धाम पहुंच गया। इसी कारण से प्राचीन काल से आस्थावान लोग इस व्रत को करते आ रहे हैं।

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