भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन-SHRI KRISHNA JANAMASHTAMI

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म:- भाद्रपद या श्रावण मास के कृष्ण पक्ष के अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है|इसी तिथी को श्रीकृष्ण का मथुरा नगरी मे कंस के काराग्रह मे जन्म हुआ था|इस दिन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष्य मे मंदिरो मे जगह जगह भजन कीर्तन का आयोजन होता है|सनातन धर्म की वैष्णव परंपरा मे “श्रीकृष्ण जन्माष्टमी”(SHRI KRISHNA JANMASHTAMI)को एक महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है|

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय संपूर्ण ब्रम्हांड मे शांती और सत्वगुण का वातावरण व्याप्त हो गया था|सृष्टी पर चारो दिशाओं मे सुख और समृद्धी छाई हुई थी|

भगवान श्रीकृष्ण पहले वहां अपने मुल रूप मे प्रकट हुए| वसुदेव ने देखा की उनके नवजात शिशु की चार भुजाए हैं और उसने शंख,चक्र,गदा और पद्म धारण किया हुआ है।उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह है और उन्होंने अपने कण्ठ में कौस्तुभ मणि पहना है।पीताम्बर में लिपटे काले बादल के समान श्यामल कान्ति वाले भगवान के केश घुंघराले थे। मुकुट एवं वैदूर्य मणियों वाले चमचमाते कुण्डल पहने वह शिशु अत्यन्त अद्भुत दिख रहा था। इस प्रकार श्रीकृष्ण सर्वप्रथम भगवान विष्णु के रूप में प्रकट हुए और अपनी अंगकान्ति से सम्पूर्ण कक्ष को प्रकाशित कर दिया|

वसुदेव विस्मित भी थे और आनंदित भी। अपने पुत्र के जन्मोत्सव को मनाने के लिए उन्होंने मन-ही-मन दस हजार गौंवे ब्राम्हणों को दानस्वरूप दे दी। स्वयं पूूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को अपने पुत्र रूप में देखकर वसुदेव कंस के भय से मुक्त हो गये।

देवकी माता जानती थी की भगवान विष्णु कंस से लाखों गुना अधिक शक्तिशाली हैं परन्तु स्नेहवश भय था की कही कंस उनके पुत्र की हत्या ना करदे। देवकी ने भगवान से निवेदन किया कि वे अपने विष्णुरूप को त्यागकर एक साधारण मानव पुत्र रूप में आ जाये जिससे कंस को इस बात का भान न हो की वो भगवान विष्णु है।

भगवान ने माता देवकी की प्रार्थना पर एक साधारण मानवीय बालक का रूप ले लिया। भगवान श्रीकृष्ण ने वसुदेव को निर्देश दिए की वह उन्हें उसी रात गोकुल ले जायें और यशोदा की नवजात कन्या से बदले लें। उसी रात भगवान की अध्यात्मिक शक्ति योगमाया ने भी नन्द महाराज की पत्नी यशोदा की गर्भ मे जन्म लिया था।उस समय वर्षाॠतू चल रहा था। आकाश में बिजली चमक रही थी और मूसलधार वर्षा हो रही थी। वसुदेव और उनके अलौकिक पुत्र की रक्षा करने हेतु अनंतशेष ने उनके उपर अपने फनों को फैला लिया।

वर्षा की वजह से यमुना नदी उफल रहीं थी।वसुदेव जब यमुना के तट पर पहुंचे तब स्वयं यमुना नदी ने उनके लिए मार्ग बनाया। नन्द महाराज के घर पहुंचकर वसुदेव ने देखा की नन्द महाराज के घर के सारे सदस्य निद्रा में हैं। उन्होंने सहजता से यशोदा के बिस्तर पर अपने पुत्र को रखा और उनकी पुत्री को उठा लिया।

प्रसवपीडा से बुरी तरह थकी यशोदा माता गहरी नींद में सोयी हुई थी और उन्हे इस बात तक का आभास नहीं था की उन्होने संतान को जन्म दिया है।

वसुदेव भली भांति जानते थे की समाचार मिलते ही कंस उस कन्या का वध करने का प्रयास करेगा।अत्यन्त उद्विग्न अवस्था में कंस क्रोध में वहा पहुंचा।उसे देखकर देवकी माता उससे निसहाय होकर क्षमा याचना करने लगी।लेकिन देवकी माता को प्रताडते हुए उसने उनके हाथ से कन्या छीन ली।

कंस ने उस कन्या के दोनों पैरों को पकड़ा और घुटनों के बल बैठकर उसे पत्थरीले फर्श पर टकराने के लिए हवा में उपर उठा लिया।तभी वह कन्या कंस के हाथों से फिसल गयी और आकाश में जाते हुए उसने अष्टभुजाओं वाली दुर्गा देवी का रूप धारण किया।फिर दुर्गा देवी ने कंस को चेतावनी दी।इसप्रकार कंस को चेतावनी देकर योगमाया दुर्गा देवी पृथ्वी पर भिन्न भिन्न स्थानों पर प्रकट होकर विभिन्न नामों से विख्यात हुई।

जनिए- (SHRI KRISHNA JANMASHTAMI SPECIAL) भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय प्रकृति मे हुए बदलावो का अद्भुत और रोमांचकारी वर्णन

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