कैलाश पर्वत का रहस्य – मानसरोवर और राक्षसताल का रहस्य

(कैलाश पर्वत का रहस्य) जब बात आती है विश्व में सर्वश्रेष्ठ और रहस्यमयी पर्वत की तो सबसे पहले हमारे मुख में कैलाश मानसरोवर का नाम आता है। कैलाश पर्वत विश्व में सबसे ऊंचा पर्वत नहीं है पर फिर भी कैलाश पर्वत,मानसरोवर और राक्षस ताल झील की इतनी महिमा क्यों है,आइए जानते है विस्तार मैं।

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कैलाश पर्वत के कुछ तथ्य –

सनातन धर्म मे कैलाश पर्वत एक पवित्र जगह है। कैलाश मानसरोवर भगवान शिव का स्थान है। प्राचीन तिब्बती कहानियों के अनुसार भी ऐसे स्थान पर जहां बादलों के बीच भगवान का वास हो,ऐसै स्थान पर जाना असंभव है। इसके समीप जाने वाले सभी प्राणी वहां के प्राकृतिक सौंदर्य से प्राकट होकर आनंदविभोर हो जाते है। इसके समीप जानेवाले मानव अपनी ग्राह्यशक्ति के अनुसार शिव तथा पार्वती का साक्षात्कार करते हैं। इस कारण से पुराणों में शिव तथा पार्वती के निवासस्थान के रूप मे इसका वर्णन किया गया है वो सत्य हैं।(कैलाश पर्वत का रहस्य)

विश्वकर्मा की अति प्राचीन और प्रसिद्ध कारीगरी की शुभ्र और निर्दोष आदर्श छवी स्वरूप कैलाश शिखर अपनी सम्मोहनी और विवश करनेवाली सौंदर्य राशि के साथ सर्वदा स्वच्छ श्वेत हिम से आच्छादित होकर,पीठिका के उपर स्थापित महान रजत लिंग के समान शोभायमान है। वास्तव में यह श्री कैलाश शिखर जगत्वष्टा की ऐश्वर्यमयी विभूति का अनुपम एव निराला चमत्कार हैं।

कैलाश मानसरोवर के आसपास समय का एक अलग ही चलन रहता है। इस पर्वत के आसपास की हवा हमे जल्दी बुढापें की ओर ले जाती है। कैलाश पर्वत यात्रा करने गए लोगों ने बताया है की यहापर नाखून तथा बाल 12 घंटो मे ही बढ जाते है। नाखून और बालों को बढने के लिए साधारण दो सप्ताह लगते है पर यहापर वो सिर्फ 12 घंटो मे ही बढते है। रूसी शोधकर्ता कैलाश पर्वत को एक मानव-निर्मित पिरामिड मानते है,जिसे किसी दैवी शक्ति वाले मनुष्य ने बनाया है।

कैलाश पर्वत पर चढना इतना कठीन क्यो है?

शाश्त्रो से भी हम जान सकते है की कलयुग से पहले मनुष्य पर सफलतापूर्वक जाते थे। परंतु वर्तमान समय में (कलयुग) में ऐसे बहुत कम लोग है जो उसके पात्र हैं। यह कोई साधारण पर्वत नही है। यह एक अध्यात्मिक शक्ति से युक्त जगह है जहां स्वयं शिवजी निवास करते है। इसी कारण इस पर्वत पर कोई साधारण मनुष्य नही चढ सकता। पर्वत पर सफलतापूर्वक चढाई करने के लिए एक विशिष्ट अध्यात्मिक पात्रता की आवश्यकता हैं।(कैलाश पर्वत का रहस्य)

कैलाश पर्वत का भौगोलिक वर्णन –

यह पर्वत पृथ्वी के मध्य में स्थित है। कैलाश पर्वत पृथ्वी का केंद्र भी माना जाता हैं। भूवैज्ञानिकों के अनुसार यह पर्वत छह और पर्वतो के बीच में स्थित है। जोकी कमल के फूल की तरह प्रतीत होता है। कैलाश मानसरोवर धरती का केंद्र है। इसकी एक परिक्रमा 52 किलोमीटर की होती है। इस पर्वत की परिक्रमा करने से मनुष्य को बहुत सारे फल मिलता है।

पृथ्वी पर बहुत सारे पर्वत उपस्थित है,जिनमें से सबसे ऊंचा है माउंट एवरेस्ट। इस पर्वत की ऊंचाई 8848 मीटर है। वहीं दुसरी और इसकी ऊंचाई 6638 मीटर है। यानिकि इसमे और माऊंट एवरेस्ट में 2000 मीटर का फर्क है। माऊंट एवरेस्ट पर 7000 से ज्यादा लोग सफल चढाई कर चुके है। माऊंट एवरेस्ट पर सफल चढाई करने वाले लोगों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढती जा रही है। परंतु बात करे वर्तमान समय की तो इसपर पर कोई नही चढ पाया। प्राचीन भारत में कई ऐसे सिद्ध पुरूष थे जो महादेव से मिलने उपर जाते थे।

कैलाश पर्वत और मानसरोवर से जुडे वैज्ञानिक तथ्य और रहस्य –

यह पर्वत के आसपास के क्षेत्र में और मानसरोवर,राक्षसताल झील के पास एक ध्वनि सुनाई पडती हैं। यह ध्वनि किसी डमरू के जैसी एवं ॐ शब्द के उच्चारण जैसी प्रतीत होती हैं। वैज्ञानिकों का यह मानना है की यह आवाज बर्फ के पिघलने की और उसमें से हवा बहने की आवाज हैं। परंतु वैज्ञानिकों के पास इसका कोई ठोस सबूत नहीं है।

इस पर्वत पर चढाई करने गए एक समुह को यह अनुभव हुआ था। यह विदेशी समुह कैलाश पर्वत के यहां रात में ठहरा था तभी उनकों ऐसा अनुभव हुआ। उन विदेशी लोगों ने यह अनुभव किया की कैलाश पर्वत के पास जाते ही उनके दिल की धड़कन बढने लगती हैं। उन लोगों ने ऐसा अनुभव किया की कैलाश पर्वत के क्षेत्र में रहते हुए उन लोगों के नाखुन एवं बाल तेजी से बढ रहे थे। उनके शरीर का विकास बहुत तेजी से हो रहा था। मानों ऐसा लग रहा था कि उनकी आयु तेजी से बढ रही हैं। इसपर पर चढने वाला लोगों ने यह बताया है की पर्वत के क्षेत्र में थकान एवं ऑक्सिजन की कमी महसूस होती हैं। इन सभी आश्चर्यों और रहस्यों को ध्यान में रखते हुए,भारत सरकार ने पीछले 20 वर्षों से इसपर चढाई करने के लिए रोक लगाई हैं|(कैलाश पर्वत का रहस्य)

सबसे श्रेष्ठ कोण? विज्ञान या अध्यात्म –

वैज्ञानिकों का यह मानना है की कैलाश पर्वत के क्षेत्र में रेडिएशन बहुत ज्यादा है इसलिए यहापर कंपास काम नही करता। पर हमारे सनातन धर्म के शास्त्रों के अनुसार यहांपर दस दिशाए एकसाथ मिलती है इसलिए यहापर ऐसा होता है। ऐसे बहुत रहस्य है जिससे हमें पता चलता है की हमारा सनातन धर्म ही कितना श्रेष्ठ और सही है।

जहांपर विज्ञान के सभी तर्क वितर्क काम करना बंद कर देते है,वहां से अध्यात्म की शुरूआत होती है।

आज भी इस पर्वत पर भगवान शिव और उनके भक्तगणों का वास है। हमारे सनातन धर्म के शास्त्रों मे कैलाश पर्वत के बारे में विस्तार से बताया गया है।

मानसरोवर और राक्षसताल झील –

कैलाश पर्वत की घाटी में दो झीलें उपस्थित है। उन दी झीलों के नाम है मानसरोवर झील और राक्षसताल झील। यह दोनों झीलें अपने आप में एक बड़ा रहस्य है। इन दोनों झीलों के आसपास हमे अलग सी शक्ति का अनुभव होता है। कैलाश पर्वत के चारों दिशाओ से चार नदियों का उद्गम होता है। यह चार नदियां मानसरोवर झील और राक्षसताल झील से निकलती है। समुद्रतल से इन दोनों झीलों की उंचाई 14950 फीट है। दोनों झीलें एक-दुसरे से बहुत करीब है।(

मानसरोवर झील (कैलाश पर्वत का रहस्य)-

मानसरोवर झील सकारात्मकता को प्रदर्शित करता है। मानसरोवर झील का पानी दुनिया में सबसे साफ पानी है। मानसरोवर झील का आकार सूर्य की तरह है। किसी भी मौसम में मानसरोवर झील हमेशा शांत रहती है।

कैलाश मानसरोवर का इतिहास –

एक समय सनक,सनन्दन,सनातन,सनत्कुमार आदि ॠषी कैलाश पर्वत पर शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे। इसी अवधि में बारह वर्षों तक अनावृष्टी होने के कारण आसपास की सब नदिया सूख गई। स्नान आदि के लिए ॠषीयोंको बहुत दुर मंदाकिनी तक जाना पडता था। इसलिए उनकी प्रार्थना पर ब्रम्हा जी ने अपने मानसिक संकल्प से कैलाश के पास एक सरोवर का निर्माण किया और स्वयं ब्रम्हा जी ने उसमे हंस रूप में प्रवेश किया। ब्रम्हा जी की मानसिक सृष्टि होने के कारण इसका नाम मानसरोवर पडा। मानसरोवर के जल के उपर सरोवर के मध्य भाग में एक कल्पवृक्ष उत्पन्न हुआ।

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मानसरोवर झील का विस्तृत वर्णन(कैलाश पर्वत का रहस्य) –

अति गंभीर और अध्यात्मिक स्पंदनों से युक्त पुनीत मानसरोरव चारों दिशाओं से पर्वतों से घिरा हुआ हैं। जब उत्तुंग तरंगे उठती हैं तो यह महासागर की भांति भीषणरूप धारण कर प्रणववाद करने लगता हैं। कभी-कभी तो मानसरोवर कैलाश पर्वत,पोनरी,मांधाता आदि शिखरों के लिए महादर्पन बन जाता हैं। जब मानसरोवर जम जाता हैं,तब पूर्व में उदय होनेवाले सूर्य की कांतियों को पूर्व से लेकर पश्चिम तट तक स्वर्ण या रतनमयी धारा प्रतिबिंबित करता हैं। मध्यान्ह के समय अपनी तरंगों से मिलकर सूर्य के किरणों को परावर्तित करता हुआ आंखो को चकाचौंध करता हैं। कभी-कभी तो मानसरोवर स्वयं के नीलवर्ण को छिपाकर,कुछ समय के लिए मेघों के विविध रंगों को धारण करता हैं। एक क्षण महा प्रणवनाद का उद्घोष करता है और दुसरे ही क्षण महाशून्य की भांति निशब्द हो जाता हैं।

मानसरोवर का प्राकृतिक सौंदर्य –

कभी-कभी नीली जलराशी से युक्त लहरों से प्रसन्नता और सुख को दर्शाता है,तो कभी बर्फ में जमकर शांति तथा गंभीरता को दर्शाता हैं। इस पवित्र मानसरोवर के वक्षस्थल पर हंसों के झुंड क्रिडा करते हैं। वसंत ऋतु में मानसरोवर में हंस के जोडे अपने दस-दस पांच-पांच बच्चों को बीच में रखकर खेलते हुए दिखाई देते हैं। उनके अनुपम सौंदर्य,मंद गमन तथा आनंद और उमंग को देखकर मन प्रसन्न हो उठता हैं। कभी-कभी हिमालय में रह रहे दूसरें हंस के झुंड कैलाश पर्वत के निकट मानसरोवर के पास आकर विश्राम करते हैं।

मानसरोवर कभी श्रद्धा से परिक्रमा कर रहे भक्तों को किनारे से जाने के लिए मार्ग देता है,तो कभी पानी से उस मार्ग को ढककर भक्तों को वहां जाने की अनुमति नहीं देता। साष्टांग प्रदक्षिणा करने आए हुए भक्तों के पैर न भीग न पावे इस उद्देश्य से यह कई नदियों को सुखा और जमा देता हैं। कैलाश पर्वत के निकट मानसरोवर की गोद में अनेक साधु ध्यान करने के लिए आते हैं,मानसरोवर का यह पवित्र वातावरण उन्हें योगनिद्रा में मम कर देता हैं। कभी-कभी तो मानसरोवर इतनी ठंड निर्माण करता है की अपने किनारे पर किसीको ठहरने ही नहीं देता। सात्विकता और पवित्रता से पूर्ण मानसरोवर का यह पवित्र वातावरण भक्तों के मनों को सुख,शांति प्रदान करता हैं। मानसरोवर का यह वातावरण लोगों के मनों में वैराग्य की भावना जागृत करता हैं।(कैलाश पर्वत का रहस्य)

राक्षसताल झील(कैलाश पर्वत का रहस्य) –

कैलाश पर्वत का रहस्य

राक्षसताल झील नकारात्मकता को प्रदर्शित करता है। कैलाश पर्वत के पास राक्षसताल झील के किनारे रावण ने भगवान शिव की आराधना कि थी। राक्षसताल झील एक खारे पानी की झील है। राक्षस ताल झील का आकार चंद्र की तरह है। राक्षसताल झील का व्यवहार हमेशा उथल-पुथल वाला होता है| राक्षसताल मानसरोवर से 20 दिन या एक मास पहले जम जाता हैं और 15-20 दिन बाद पिघलता हैं। राक्षसताल अक्टूबर महिने के मध्य भाग से ही जमना प्रारंभ हो जाता हैं। कहीं कहीं एक-एक मील तक जम जाता हैं।

कैलाश मानसरोवर क्षेत्र की नदिया –

१.कैलाश पर्वत के पास सतलज नदी का उद्गम मानसरोवर से 37 मील पश्चिम में दुलचू गोम्पा के समीपवाले स्त्रोतों में हुआ है।

२.सिंधु नदी का उद्गम कैलाश के उत्तर में और मानसरोवर से 62 मील की दूरी पर सिंगो खम्बब नामक स्त्रोतों में हुआ है।

३.कैलाश के पास ब्रम्हपुत्रा नदी का उद्गम मानसरोवर के आग्नेय कोन में 63 मील की दुरी पर चेमायुडडुड के हिमनदियों से हुआ हैं।

४.करनाली नदी का उद्गम मानसरोवर के वायव्य कोन में 30 मील की दूरी पर मच्पा चुगो नामक स्त्रोतों से हुआ हैं।

कैलाश पर्वत का रहस्ययदि जल के परिणाम से देखा जाए तो सतलज का उद्गम दारमा याडती नदी के सिरे पर दारमा घाट के पास से हुआ हैं। सिंधु नदी का उद्गम गरनोट छू के सिरे पर तोपछन घाट में हुआ हैं। ब्रम्हपुत्रा का उद्गम कुत्री कडरी हिमनदियों से हुआ हैं। करनाली नदीं का उद्गम लपिया घाट से हुआ हैं।(कैलाश पर्वत का रहस्य)

इस अवस्था में इन चारों नदियों का उद्गम हिमनदियों से ही हुआ हैं। परंतु तिब्बती परंपरा के अनुसार करनाली छोडकर बाकी नदियों का उद्गम स्थान च्युत हो जाता हैं,या बदल जाता हैं।(कैलाश पर्वत का रहस्य)

इन नदियों के उद्गम स्थान को लेकर वर्षों से चर्चा होती चली आ रही हैं।

हिंदू पुराण गाथाए(कैलाश पर्वत का रहस्य) –

पुराणों के अनुसार इस धरती पर कैलाश पर्वत सुमेरू पर्वत का अभीरूप है| कैलाश मानसरोवर धरती और स्वर्ग तथा सांसारीक और अध्यात्मिक संबंध को दर्शाता है। पुराणों मे लिखा है की इसके उपर धरती तथा स्वर्ग का मिलन होता है। यह पर्वत रहस्यमयी होने के साथ साथ एक पवित्र स्थान भी माना जाता है। सदियों से कई श्रद्धालू इसकी परिक्रमा करते आ रहे है।

रावण की कथा –

कैलाश पर्वत पर एक समय लंकाधीश रावण ने कई वर्षों तक कैलाशपति शंकर की तपस्या की थी। रावण ने कि तपस्या से शिवजी प्रसन्न नही हुए और उसे दर्शन तक नहीं दिए। इसपर रावण एक दिन कैलाश पर्वत के नीचे घुसा और चाहा की उसको जोर से हिला दे ताकि शिवजी अपनी समाधी से उठकर इष्ट वरदान दें। रावण के इस उद्देश्य को जानकर शिवजी ने पहले ही उसे उसके नीचे दबा दिया जिससे कि वह बाहर न निकल सके। फिर रावण ने अपने दस सिरों में से एक को काटकर उसका सितार बनाया और शिव के परम प्रिय तांडव नृत्य का स्तोत्र रचकर गाने-बजाने लगा। इस बात से प्रसन्न होकर शिवजी ने रावण को वरदान दिया।(कैलाश पर्वत का रहस्य)

महाराज मांधाता की कथा –

एक अन्य गाथा के अनुसार महाराज मांधाता ने कैलाश पर्वत के इस सरोवर का पहले पता लगाया। मानसरोवर के दक्षिण की ओर के पर्वत पर मांधाता ने तपस्या की,जिससे वह पर्वत अब भी मांधाता के नाम से जाना जाता है। इसे गुरला मांधाता भी कहते हैं। तिब्बती भाषा में इसे नमोनानी या मेमोनानी भी कहते हैं। मांधाता तिब्बत में सबसे ऊंचा पर्वत हैं।

दत्तात्रय ऋषी की कथा –

दत्तात्रेय ऋषी विंध्याचल से हिमालय का अवलोकन कर हिमालय के दर्शनार्थ गए। उन्होने मानसरोवर में स्नान करके राजहंसों का दर्शन किया। तदुपरांत कैलाश पर्वत की एक गुफा में उन्हें शिव-पार्वती के दर्शन प्राप्त हुए। दत्तात्रेय ऋषी ने शिवजी से पुछा की संसार में सबसे पवित्र स्थान कौन सा हैं? शिवजी ने कहां ‘सबसे पवित्र स्थान हिमालय हैं,जिसमें कैलाश और मानसरोवर विराजमान हैं। हिमालय के स्मरण मात्र से व्यक्ति के पाप धूल जाता हैं। शिवजी ने बताया की मेरे कैलाश का ध्यान,दर्शन,स्पर्श, आदि का अनंत फल हैं। उसका वर्णन शब्दों द्वारा नहीं किया जा सकता। वह धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष चारों पुरूषार्थों का प्रदाता हैं।

कैलाश पर्वत कहां है ?

कैलाश पर्वत तिब्बत में स्थित हैं। कैलाश पर्वत का थोडासा हिस्सा भारत और चीन में भी स्थित है।

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