कामदा एकादशी व्रत – कामदा एकादशी का महत्व,पूजन विधी

कामदा एकादशी व्रत का महत्व

कामदा एकादशी व्रत का महत्व-

पुराणों में कहा गया है कि चर और अचर सहित इस संसार में इस कामदा एकादशी व्रत से अधिक उत्तम और कोई दूसरी एकादशी नहीं है। यह वर्ष की पहली एकादशी मानी जाती है। वैसे तो एकादशी व्रत का प्रादुर्भाव उत्पन्ना एकादशी’ से ही माना है।एकादशी व्रत रखने से भक्तों की समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं तथा बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।(कामदा एकादशी व्रत)

इस एकादशी का व्रत रखने से क्या फल मिलता है?

सब तरह के पापों का नाश होता है। यहां तक कि ब्रह्माहत्या जैसे पापों से भी छुटकारा मिल जाता है|पिशाचत्व दूर होता है।एकादशी व्रत की कथा पढ़ने और सुनने सेवाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।(कामदा एकादशी व्रत)

इस एकादशी की पूजन विधि,विधान-

यह एकादशी व्रत चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। कहा जाता है कि एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि अर्थात दोनों पक्षों की एकादशी में भोजन नहीं करना चाहिए। दशमी को यानी व्रत के पहले दिन जौ,गेहूं,मूंग में बने पदार्थ दोपहर के भोजन में एक बार सेवन करने का विधान है।एकादशी के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। दिन भर उपवास रखें।एकादशी व्रत का संकल्प ममाखिल पापक्षयपूर्वक प्रीतिकामनया कामदैकादशी व्रतं करिष्ये कहकर रात्रि में भगवान् को झूले में बैठाएं|फिर धूप-दीप, पुष्प, माला चढ़ाकर पूजन करें।कथा वाचन के पश्चात् मिष्ठान का भोग लगाकर सबको प्रसाद दें। रात्रि में भजन, कीर्तन कर जागरण करें और दूसरे दिन पारण करें। उपवास में केवल फलाहार लें।अन्न का सेवन पूर्णतया त्याग दें।(कामदा एकादशी व्रत)

कामदा एकादशी की कथा –

प्राचीन समय में रतनपुर नाम का एक नगर था। रतनपुर में पुंडरीक नाम का एक राजा राज्य करता था। रतनपुर में अप्सराएं,किन्नर एवं गंधर्व वास करते थे। वहापर एक ललिता और ललित नाम के पती पत्नी एक अत्यंत वैभवशाली घर में निवास करते थे। ललिता और ललित एक दूसरें से बहुत प्रेम करते थे। वह एक दूसरे के बगैर रह भी नहीं हो सकते थे। एक बार पुंडरीक के सभा में उत्सव का आयोजन किया गया था। उस उत्सव में गंधर्व गा रहे थे। उनमे ललित भी गा रहे थे। गाते वक्त ललित को अपनी प्रिया ललिता का स्मरण हुआ और उसके स्वर टूटने लगे।(कामदा एकादशी व्रत)

बारंबार ललित के स्वर भंग होने का कारण एक नाग ने उसका कारण राजा को बता दिया। तब राजा पुंडरीक ने क्रोध में आकर कहा कि ‘मेरे सामने गाते समय तु अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है,अब तु एक कच्चा मांसभक्षी नरभक्षी राक्षस बनेगा’। राजा पुंडरीक के श्राप से ललित शीघ्र ही एक राक्षस में परिवर्तित हो गया। उसका पुरा शरीर राक्षस के समान हो गया। इसप्रकार से वह राक्षस होकर यातनाए भोगने लगा। जब उसकी प्रियतमा ललिता को यह पता चला तब उसे अत्यंत खेद हुआ। ललिता अपने पति का उद्धार करने के लिए सोचने लगी। ललित जहां भी जाता वहां ललिता जाती। एक बार ललित विंध्याचल पर्वत पर जा पोहोंची।

वहांपर श्रृंगी ॠषी का आश्रम था। आश्रम में जाकर ललिता प्रार्थना करने लगी। ललिता ने ऋषी को सबकुछ बता दिया। उसके बाद ऋषी ने ललित के उद्धार के लिए ललिता को कामदा एकादशी का व्रत करने को कहां। ऋषी ने कहा की पहले तुम व्रत करों और उसका पुण्यफल ललित को दो, उससे ललित का उद्धार हो जाएगा। ललिता ने श्रद्धा के साथ चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत किया। द्वादशी को ब्राम्हणों के सामने यज्ञ करके कामदा एकादशी का पुण्यफल ललित की दान किया। ऐसा करने से शीघ्र ही ललित राक्षस योनि से मुक्त हो गया। ललित का उद्धार होने के बाद वो दोनों विमान में बैठकर स्वर्ग लोक चले गए।(कामदा एकादशी व्रत)

इसप्रकार एकादशी व्रत को विधीवत करने से पापों का नाश होता है। वास्तव में हर एक एकादशी का पुण्य अपार है। एकादशी का व्रत करने से मनुष्य पापों से मुक्त होकर भवसागर को तर जाते है।

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